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हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा बकरी-श्वान पर सख्ती, कबूतरों पर चुप्पी? मीरा भायंदर की भाजपा राजनीति पर उठे सवाल
मीरा भायंदर सिटी न्यूज मुंबई शकील शेख
शहर में बकरी, श्वान और कबूतरों को लेकर मनपा की नीतियां अब सियासी बहस का नया मुद्दा बन गई हैं।
मीरा भायंदर मनपा की महासभा में सार्वजनिक स्थानों पर बकरी ईद के दौरान बकरों को रखने और श्वानों को खाद्य देने से जुड़े नियमों पर प्रस्ताव लाए गए। इसी को लेकर नागरिकों के एक वर्ग ने तीखा सवाल उठाया है—
क्या नियम सबके लिए समान हैं, या राजनीति देखकर उनकी सख्ती बदल जाती है?
कबूतरों पर चुप्पी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल कबूतरोंको लेकर उठ रहा है। नागरिकों का आरोप है कि शहर में बड़ी संख्या में कबूतरों को खाद्य दिया जाता है, जिससे गंदगी फैलती है स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं जन्म लेती हैं हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया है ।
पहले भी सार्वजनिक स्थानों पर कबूतरों को दाना डालने पर रोक लगाने की बात सामने आती रही है, लेकिन ठोस कार्रवाई को लेकर सवाल बने हुए हैं।
बकरी ईद और मुस्लिम समाज की नाराजगी
दूसरी ओर बकरी ईद के मद्देनजर बकरों पर सख्त नियमों का प्रस्ताव आने से मुस्लिम समाज में नाराजगी की चर्चा है।
सवाल यह है
अगर सार्वजनिक सोसायटी स्थानों पर बकरों को रखना पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाता है, तो मुस्लिम समाज अपनी सालाना धार्मिक परंपरा को किस तरह निभाएगा?"बकरे कहा रखेगा
विरोध करने वालों का आरोप है कि सत्ताधारी भाजपा ने बहुमत के बल पर महासभा में यह प्रस्ताव पारित कराया, जबकि विपक्ष के पास इसे रोकने या पर्याप्त चर्चा कराने की सीमित गुंजाइश रही है विपक्ष ने उस तरह से विरोध क्यो नहीं किया ।
अनुत्तरित सवाल
अभी तक जिन अहम सवालों पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है -मुस्लिम बहुल सोसायटियों में बकरी ईद के लिए बकरों को रखने की अनुमति होगी या नहीं?
- यदि सार्वजनिक स्थानों पर कुर्बानी पर रोक है और पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध नहीं है, तो प्रभावित परिवारों के सामने व्यावहारिक विकल्प क्या बचेगा?
-धार्मिक परंपरा निभाने के लिए लोग कहां जाएंगे?
असली सवाल
क्या ये नियम शहर की सफाई और स्वास्थ्य के लिए हैं — या समाज के हिसाब से अलग-अलग?
यह बहस अब मीरा भायंदर की सड़कों से निकलकर राजनीतिक गलियारों तक पहुंच चुकी है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और तीखी नोकझोंक देखने को मिल सकती है।
अनिल सावंत ने जताया विरोध ...
नगरसेवक अनिल सावंत ने इस प्रस्ताव पर सवाल उठाते हुए कहा कि दुकानों में साफ-सफाई और स्वच्छता को लेकर नियम बनाने का हम समर्थन करते हैं, लेकिन किसी विशेष समाज और नॉनवेज खाने वाले लोगों को बहुमत के बल पर निशाना बनाना गलत है। उनके मुताबिक, प्रस्ताव जिस तरह से लागू किया गया है, उससे शहर की करीब 60 प्रतिशत मटन और चिकन की दुकानें प्रभावित होकर बंद होने की स्थिति में आ सकती हैं। उनका आरोप है कि स्थानीय नॉनवेज कारोबारियों , खाने वालो के हितों को नजरअंदाज कर वोट बैंक को ध्यान में रखकर फैसला लिया गया है।
इस फैसले के खिलाफ मीरा भायंदर का मुस्लिम समाज अब सरकार के समक्ष अपनी शिकायत रखने की तैयारी में है। समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि जरूरत पड़ने पर हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा। फैसले को लेकर मुस्लिम समाज में काफी नाराजगी और विरोध देखने को मिल रहा है।
वहीं, इस विवाद का असर अब उत्तन के कोली समाज में भी दिखाई देने लगा है। शहर में चर्चा है कि यदि नॉनवेज और बकरी ईद की धार्मिक परंपराओं को लेकर इस तरह की पाबंदियां लगाई जा सकती हैं, तो आने वाले समय में मछुआरा समाज की पारंपरिक गतिविधियों पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
आलोचकों का सवाल है—आज बकरे और मटन-चिकन की दुकानें निशाने पर हैं, कल मछुआरों की बारी तो नहीं?
हालांकि यह फिलहाल शहर में चल रही राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का हिस्सा है। प्रशासन और सत्ताधारी पक्ष का आधिकारिक पक्ष इस विवाद पर सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा।







