19 अक्टूबर यौमे-ए-पैदाइश पर विशेष असररुल हक़ मज़ा: रोमांटिक और क्रांतिकारी शायर
City News Mumbai••4 व्यूज़•7 मिनट पढ़ें
हसरत अली असरारुल हक़ मजाज़ प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े एक रोमानी शायर के रूप में उर्दू साहित्य में प्रसिद्ध हैं। लखनऊ से उनके गहरे जुड़ाव के कारण उन्हें 'मजाज़ लखनवी' के नाम से भी जाना गया। बहुत कम रचनाएं लिखने और शुरुआती उपेक्षा के बावजूद उन्होंने अपार प्रसिद्धि प्राप्त की।
मजाज़ का मूल नाम असरारुल हक़ था। आगरा में रहने के दौरान उन्होंने 'शहीद' उपनाम अपना लिया था। बाद में उन्होंने अपने नाम के साथ 'मजाज़' उपनाम जोड़ लिया। उनका जन्म 19 अक्टूबर 1911 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के रुदौली गांव में हुआ था, हालांकि फ़िराक़ गोरखपुरी के अनुसार उनकी जन्म-तिथि 2 फरवरी 1909 है—जिसे प्रकाश पंडित ने भी स्वीकारा है। उनके पिता चौधरी सिराजुल हक़ थे। चौधरी सिराजुल हक़ संभवतः रुदौली के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने एलएलबी की डिग्री प्राप्त की थी; हालांकि वकालत करने के बजाय उन्होंने नौकरी को चुना और लखनऊ में रजिस्ट्रेशन विभाग में हेड क्लर्क बन गए। अपनी मेहनत और तरक्की के बल पर 1929 में वे असिस्टेंट रजिस्ट्रार के पद तक पहुंचे।
असरारुल हक़ की शुरुआती शिक्षा आगरा में हुई। उन्होंने अमीनाबाद इंटरमीडिएट कॉलेज से हाई स्कूल पास किया। सन् 1929 में उन्होंने आगरा के प्रतिष्ठित सेंट जॉन्स कॉलेज में इंटर साइंस में दाखिला लिया। उनके पिता चाहते थे कि वे इंजीनियर बनें, इसलिए उन्हें भौतिकी (फिजिक्स) और गणित विषय दिलाए गए। हालांकि, मजाज़ की विज्ञान में कोई रुचि नहीं थी, जिसके परिणामस्वरूप वे इंटरमीडिएट की परीक्षा में अनुत्तीर्ण (फेल) हो गए। इसके बाद वे अलीगढ़ चले गए, जहां उन्हें एक बार फिर से इंटरमीडिएट की पढ़ाई की शुरुआत करनी पड़ी। इस बार उन्होंने विज्ञान के बजाय कला (आर्ट्स) विषय चुना और सफलतापूर्वक परीक्षा पास की। सन् 1931 में कॉलेज के एक मुशायरे में अपनी बेहतरीन गज़ल के लिए उन्हें गोल्ड मेडल भी मिला। सन् 1935 में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से स्नातक (बी.ए.) की डिग्री पूरी की। इसके बाद उन्होंने एम.ए. में भी दाखिला लिया, लेकिन अधिक रुचि न होने के कारण वे इसे पूरा नहीं कर सके। शायरी के अलावा मजाज़ को हॉकी का भी बहुत शौक था और वे एक बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी थे।
असरारुल हक़ मजाज़ ने अपनी पहली नौकरी ऑल इंडिया रेडियो में की थी। सन् 1935 में उन्होंने एक साल तक ऑल इंडिया रेडियो की पत्रिका 'आवाज़' के सहायक संपादक के रूप में कार्य किया। हालांकि, यह नौकरी अधिक समय तक नहीं टिक सकी। दिल्ली में उन्हें न तो करियर में कोई बड़ी सफलता मिली और न ही प्रेम में। मार्च 1939 में सिब्ते हसन, अली सरदार जाफरी और मजाज़ ने मिलकर 'नया अदब' नाम से एक उर्दू पत्रिका निकाली, जो आर्थिक तंगी के कारण ज्यादा दिनों तक प्रकाशित नहीं हो पाई। सन् 1940 में मजाज़ को पहला नर्वस ब्रेकडाउन (तांत्रिक अवसाद) का दौरा पड़ा। बेरोजगारी और भविष्य को लेकर निराशा ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था। लखनऊ में इलाज के बाद जब वे स्वस्थ हुए, तो अपनी बड़ी बहन के साथ अल्मोड़ा चले गए। कुछ महीनों बाद पूरी तरह से ठीक होकर वे वापस लौटे। मई 1942 से 1945 तक उन्होंने हार्डिंग लाइब्रेरी में नौकरी की। यहीं पर 1945 में उन्हें दूसरी बार नर्वस ब्रेकडाउन का सामना करना पड़ा। उन्हें ऐसा महसूस होने लगा था कि साहित्य जगत में उनकी शायरी को उचित सम्मान और मूल्यांकन नहीं मिल रहा है। इस बात को सहन न कर पाने के कारण वे अत्यधिक मदिरापान करने लगे, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें फिर से इस गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या का सामना करना पड़ा।
सन् 1952 में उन्हें तीसरा और सबसे गंभीर नर्वस ब्रेकडाउन का दौरा पड़ा, जिसके बाद उन्हें दिल्ली से लखनऊ लाया गया। उस समय उनकी देखभाल करने वाला कोई करीबी परिवारिक सदस्य पास नहीं था। खराब स्वास्थ्य के बावजूद वे कोलकाता में आयोजित एक अमन (शांति) सम्मेलन में शामिल होने चले गए। जब वहां उनकी स्थिति अत्यधिक बिगड़ गई, तो उनके भाई अंसारी हिरवानी और दोस्त यूसुफ इमाम कोलकाता पहुंचे, उन्हें समझा-बुझाकर हवाई जहाज से रांची लाए और वहां के एक अस्पताल में भर्ती कराया। उर्दू के प्रसिद्ध लेखक सुहैल अज़ीमाबादी ने वहां उनकी बहुत मदद की। छह महीने के इलाज के बाद वे स्वस्थ होकर घर लौटे। वापसी के कुछ ही समय बाद उनकी बहन सफिया अख्तर का निधन हो गया, जो मजाज़ के लिए एक बहुत बड़ा आघात था। अंततः 5 दिसंबर 1955 को रात दस बजकर बाईस मिनट पर लखनऊ में उनका देहान्त हो गया। मजाज़ प्रगतिशील लेखक संघ के प्रमुख स्तंभ अली सरदार जाफरी के करीबी संपर्क में थे और प्रगतिशील विचारधारा से गहराई से प्रभावित थे। स्वभाव से रोमानी शायर होने के बावजूद उनकी रचनाओं में प्रगतिशीलता के स्पष्ट तत्व मिलते हैं। सटीक शब्दों का चयन और उनकी भाषा का सहज प्रवाह उनकी लोकप्रियता के मुख्य आधार बने। उन्होंने लिखा बहुत कम, लेकिन जितना भी लिखा, उसने उन्हें पाठकों के दिलों में अमर कर दिया।
प्रसिद्ध आलोचक कलीमुद्दीन अहमद, जो आमतौर पर उर्दू शायरी की कड़ी आलोचना करने के लिए जाने जाते हैं, ने भी मजाज़ की रचनाओं में कुछ कमियां निकालने के बावजूद यह स्वीकार किया कि उनकी गज़लों के विषय अत्यंत नवीन हैं और उनमें एक सुव्यवस्थित क्रमबद्धता पाई जाती है। 'नज़र-ए-दिल', 'आज की रात' और 'मजबूरियां' जैसी रचनाएं उनके कड़े परिश्रम का परिणाम हैं... शब्दों पर उनका गज़ब का अधिकार था और उनकी वर्णन शैली में प्रवाह तथा ताजगी दोनों मौजूद थीं।
सज्जाद ज़हीर ने मजाज़ की प्रतिभा, काव्य-शक्ति और विषयगत विशिष्टता का मूल्यांकन करते हुए लिखा है:
"अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर भले ही वे समाजवादी दर्शन और समकालीन राजनीतिक विचारों से परिचित थे, लेकिन वे बौद्धिक और सैद्धांतिक ज्ञान प्राप्ति के लिए लगातार प्रयास करते हुए नहीं दिखते थे। किसी भी काम को व्यवस्थित और धैर्य के साथ करना उनके स्वभाव में नहीं था। उनके मिजाज में एक महीन और मनमोहक रंगीनियत थी। सुंदर एवं संगीतात्मक शब्दों और सामासिक पदों के प्रयोग से वे अपनी शायरी में हर्ष, उल्लास और रुमानियत का ऐसा वातावरण रच देते थे, जिसमें वे अपने दौर के मुक्ति-कामी युवाओं की बेचैन आत्मा को पिरो देते थे। यह वह आत्मा थी जो समाज के उन रूढ़िवादी बंधनों से आज़ादी पाने के लिए छटपटा रही थी, जिन्होंने युवाओं की मानसिक प्रगति, आध्यात्मिक आनंद और शारीरिक उल्लास पर पहरा बिठा दिया था; जो युवाओं से उनकी स्वतंत्र सोच का अधिकार छीनकर, गरीबी के तीर से उनके जीवन के उत्साह को निराशा और अगाध वेदना में बदल देते थे। बहुत कम समय में ही वे उर्दू पढ़े-लिखे नौजवान लड़कों और शायद उनसे भी कहीं अधिक युवा युवतियों के सबसे चहेते शायर बन गए।"
वास्तव में, मजाज़ की मूल चेतना रोमानी (रोमांटिक) है। उनके काव्य में प्रेम की आकांक्षाओं और असफलताओं का बहुत ही मर्मस्पर्शी चित्रण मिलता है। शुरुआत में मजाज़ की प्रगतिशील रचनाओं के पीछे भी एक रोमानी सोच ही काम कर रही थी, लेकिन समय के साथ उनकी विचारधारा का विकास हुआ और वे अपने युग के सपनों, उम्मीदों, आकांक्षाओं और दुखों की बुलंद आवाज़ बन गए। मजाज़ ने गरीबी, असमानता और पूंजीवाद के अभिशाप के खिलाफ बेहद सशक्त क्रांतिकारी रचनाएं लिखीं, लेकिन इस दौरान उन्होंने अपनी शायरी के प्रवाह और उसकी काव्यात्मक मिठास को कभी कम नहीं होने दिया।
प्रसिद्ध शायर फैज़ अहमद फ़ैज़ ने मजाज़ की क्रांतिवादिता और उनकी कवित्व शैली के बारे में बहुत सुंदर बात कही है:
"मजाज़ की क्रांतिकारी चेतना सामान्य शायरों से बिल्कुल अलग है... मजाज़ क्रांति के कोई प्रचारक नहीं, बल्कि क्रांति के गायक हैं। उनके गीतों में बरसात के दिन की सुहानी ठंडक और बसंत की रात की मादक गर्माहट का अनोखा प्रभाव महसूस होता है।"
संदर्भ- तरक्की़पसंद तहरीक की रहगुजर, ज़ाहिद खान पृष्ठ संख्या 63,72, लोकमित्र प्रकाशन दिल्ली 2021. हसरत अली शेरपुर, जिला मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश फो़न नंबर 8580533689