6 अक्टूबर यौमे-ए-पैदाइश पर विशेष। शेख-उल-इस्लाम के नाम से प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी मौलाना सैय्यद हुसैन अहमद मदनी रह०
City News Mumbai••0 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें
मौलाना सैय्यद हुसैन अहमद रह० का आबाई वतन तो अलदादपुर टाण्डा (फैजाबाद) था, लेकिन आपकी पैदाइश 6 अक्टूबर सन् 1879 में उन्नाव जिले के बांगरमऊ कस्बे में हुई थी, क्योंकि उस दौरान आपके वालिद वहां मदरसे में मुदर्रिस थे। इब्तिदाई तालीम के बाद 12 साल की उम्र में आप दारुल उलूम (देवबंद) चले गये जहां आपने शेख-उल-हिन्द की शागिर्दी में इल्म व फिकह की तालीम हासिल की। उसके बाद आप मौलाना रशीद अहमद गंगोहवी की शगिर्दी में रहे और उन्हीं से बैयत भी हुए।
दारुल उलूम (देवबंद) से फा़रिग़ होने के बाद आप अपने अहलो-अयाल के साथ मदीना चले गये जहां 18 सालों तक इस्लामिक तालीम देते रहे। जब शेख-उल-हिन्द गिरफ़्तार हुए तो आप भी बगैर सज़ा पाये उनके साथ उनकी खि़दमत के लिए माल्टा चले गये। वहां से हिन्दुस्तान आने पर ही शेख-उल-हिन्द साहब की वफात हो गयी। तब जंगे-आज़ादी के उनके मिशन को पूरा करने के लिए आप आगे आये। जुलाई सन् 1921 को कराची में ख़िलाफत कांफ्रेंस का इजलास हुआ था, जिसकी सदारत मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने की। उस इजलास में आपके एक प्रस्ताव के ज़रिये अंग्रेज़ी हुकूमत की पुलिस और फौज में नौकरी करना मुसलमानों के लिए हराम करार दिया गया। इस तज़ावीज़ पर मौलाना डॉक्टर किचलू, मौलाना निसार अहमद और मौलाना शौकत अली ने ताईद में तकरीर किया उसके बाद जगतगुरु शंकराचार्य ने अंग्रेज़ी में अपनी तक़रीर करके इसे एक बहुत बड़ा क़दम बताया और इसकी ताईद की। इसे पास करने के बाद इसे फ़तवे की अहमियत दे दी गयी।
इस कार्यवाही को हुकूमत ने ख़िलाफ़ क़ानून कार देकर इसे ज़ब्त कर लिया और सभी को गिरफ़्तार करके कराची जेल पहुंचा दिया गया। जेल से रिहा होने के बाद आपने जमाते-उलमा-ए-हिन्द को अपनी सदारत में मज़बूत करके तहरीके-आज़ादी मैं अहम किरदार और नुमाया हिस्सेदारी करायी, जिसमें मुसलमान मुत्तहिद होकर आंदोलन के हर मुहाज़ पर किसी से पीछे नहीं रहा। मुल्क के क़ौमी ख्यालात के सभी उलमा अपनी ताक़त और सलाहियतों के साथ जंगे-मैदान पर दिखायी देने लगे थे। दौराने-आंदोलन हुसैन अहमद मदनी के साथ बड़ी तादात में उलमा जेल गये। आप टू-नेशन थ्योरी के मुख़ालिफ़ थे- यहां तक कि आपने बंटवारे के फैसले के बाद यू.पी. और बिहार में बड़ी तादात में लोगों को पाकिस्तान जाने से रोका।
इस आंदोलन का असर यह रहा कि ग्यारह में से पांच सूबों में मुस्लिम अकसरियत की हुकूमत क़ायम हुई। अप्रैल सन् 1944 में बछरायूं में जमाते-उलमा ने एक कांफ्रेंस बुलायी, जिसमें अंग्रेज़ों से लड़ने के लिए तहरीक बनाने पर गौरो-फ़िक्र होना था। इसमें आपको भी शरीक होना था, लेकिन इसके कब्ल ही आपकी गिरफ्तारी का वारेंट जारी कर दिया गया। लेकिन अवाम में आपकी मक़बूलियत की बिना पर अंग्रेज़ अफ़सर आपकों गिरफ़्तार नहीं कर सके। 24 जून सन् 1945 को आप जब ट्रेन से पंजाब जा रहे थे, तो रास्ते में देवबंद स्टेशन से गाड़ी चलने के बाद जब तिलहरी स्टेशन पहुंची तो वहां ट्रेन के डिब्बे से आपकी गिरफ्तारी हुई और आप मुरादाबाद की जेल में भेज दिये गये, जहां से आपको नैनीताल की जेल में ट्रान्सफर कर दिया। नैनीताल की जेल में मौलाना मोहम्मद फ़ाकिर इलाहाबादी, मौलाना अब्दुल हई अब्दुल मजीद, मौलाना अब्दुल कय्यूम लखनवी और मौलाना अब्दुल बारी अब्बासी गोरखपुरी पहले से ही क़ैद थे। इनमें से ज़्यादातर लोग मुल्क आज़ाद होने के बाद रिहा हुए।
रिहाई के बाद आप अपना वक़्त दारुल उलूम में तालीमी कामों में देते रहे और 5 दिसम्बर सन् 1957 को इंतकाल फरमा गये।
नोट-भारत सरकार ने मौलाना सैय्यद हुसैन अहमद मदनी रह० के सम्मान में 2012 में एक डाक टिकट स्मारक जारी किया।
संदर्भ-लहू बोलता भी है लेखक-सैय्यद शाहनवाज़ अहमद कादरी, कृष्ण कल्कि पृष्ठ संख्या 172,173 संकलन हसरत अली शेरपुर जिला मुज़फ्फ़रनगर उत्तर प्रदेश फ़ोन नम्बर 8580533689