14 अक्टूबर यौमे-ए-वफात पर विशेष। दुर्गा भाभी स्वतंत्रता आंदोलन में अपना पुरा जीवन समर्पित करनें वाली महिला।
City News Mumbai••0 व्यूज़•4 मिनट पढ़ें
हसरत अली दुर्गा भाभी का जन्म 7 अक्टूबर 1902 को शहजादपुर गाँव (जो अब कौशाम्बी जिला है) में पंडित बांके बिहारी के यहाँ हुआ। इनके वालिद (पिता) इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में नाज़िर थे और इनके बाबा (दादा) महेश प्रसाद भट्ट जालौन ज़िला में थानेदार के पद पर तैनात थे। इनके दादा पं॰ शिवशंकर शहजादपुर में ज़मींदार थे, जो बचपन से ही दुर्गा भाभी की सभी ज़रूरतों और ख्वाहिशों को पूरा करते थे।
दस वर्ष की अल्प आयु में ही इनका निकाह/विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया। इनके ससुर शिवचरण जी रेलवे में ऊँचे पद पर तैनात थे। अंग्रेज़ हुकूमत ने उन्हें 'राय साहब' का ख़िताब दिया था। भगवती चरण बोहरा 'राय साहब' का पुत्र होने के बावजूद अंग्रेज़ों की गुलामी से देश को आज़ाद कराना चाहते थे। वे क्रांतिकारी संगठन के प्रचार सचिव थे। वर्ष 1920 में पिता जी के इंतकाल (मृत्यु) के पश्चात भगवती चरण बोहरा खुलकर क्रांति के मैदान में उतर आए और उनकी पत्नी दुर्गा भाभी ने भी उनका पूरा तआवुन (सहयोग) किया। सन 1923 में भगवती चरण बोहरा ने नेशनल कॉलेज से बीए का इम्तिहान (परीक्षा) पास किया और दुर्गा भाभी ने 'प्रभाकर' की डिग्री हासिल की।
दुर्गा भाभी का मायका और ससुराल दोनों ही घराने संपन्न थे। ससुर शिवचरण जी ने दुर्गा भाभी को 40 हज़ार और पिता बांके बिहारी ने पाँच हज़ार रुपये संकट के दिनों के लिए दिए थे, लेकिन इस दंपत्ति ने इन तमाम पैसों का इस्तेमाल क्रांतिकारियों के साथ मिलकर देश को आज़ाद कराने में किया। मार्च 1926 में भगवती चरण बोहरा और भगत सिंह ने संयुक्त रूप से 'नौजवान भारत सभा' का प्रारूप तैयार किया और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर इसकी बुनियाद रखी। सैकड़ों नौजवानों ने देश को आज़ाद कराने के लिए अपने प्राणों का नज़राना पेश करने (बलिदान वेदी पर चढ़ने) की शपथ ली। भगत सिंह और भगवती चरण बोहरा समेत तमाम सदस्यों ने अपने खून (रक्त) से प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किए। 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर साथियों के साथ बम बनाने के बाद उसका परीक्षण (टेस्ट) करते समय बोहरा जी शहीद हो गए। उनकी शहादत के बावजूद दुर्गा भाभी साथी क्रांतिकारियों के साथ पूरी तरह सक्रिय रहीं। 9 अक्टूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर गोली चला दी, जिसमें गवर्नर हैली तो बच गया लेकिन सैनिक अधिकारी टेलर घायल हो गया। मुंबई के पुलिस कमिश्नर को भी दुर्गा भाभी ने गोली का निशाना बनाया, जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेज़ी पुलिस इनके पीछे पड़ गई। मुंबई के एक फ्लैट से दुर्गा भाभी और उनके साथी यशपाल को गिरफ्तार कर लिया गया। दुर्गा भाभी का अहम काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना और ले जाना था। चंद्रशेखर आज़ाद ने अंग्रेज़ों से मुकाबला करते वक़्त जिस पिस्तौल से ख़ुद को गोली मारी थी, उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दिया था। उस वक़्त भी दुर्गा भाभी उनके साथ ही थीं। उन्होंने पिस्तौल चलाने की ट्रेनिंग लाहौर और कानपुर में ली थी।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त जब सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने जाने लगे, तो दुर्गा भाभी और सुशीला मोहन ने अपनी बाँहें काटकर अपने रक्त (खून) से दोनों का तिलक लगाकर उन्हें विदा किया था। असेंबली में बम फेंकने के बाद इन सभी को गिरफ्तार कर लिया गया और फाँसी दे दी गई।
साथी क्रांतिकारियों की शहादत के बाद दुर्गा भाभी बिल्कुल अकेली पड़ गईं। वह अपने पाँच वर्षीय बेटे शचींद्र की तालीम (शिक्षा) का बंदोबस्त करने के मक़सद से हिम्मत जुटाकर दिल्ली चली गईं, जहाँ पुलिस उन्हें लगातार परेशान करती रही। इसके बाद दुर्गा भाभी दिल्ली से लाहौर चली गईं, जहाँ पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तीन साल तक नज़रबंद रखा। फ़रारी, गिरफ्तारी और रिहाई का यह सिलसिला 1931 से 1935 तक चलता रहा।
आख़िरकार लाहौर से जिलाबदर किए जाने के बाद 1935 में उन्होंने गाजियाबाद के प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका की नौकरी शुरू की और कुछ अर्से (समय) बाद दोबारा दिल्ली लौटकर कांग्रेस के साथ काम करने लगीं। कांग्रेस का माहौल रास न आने के कारण उन्होंने 1937 में इसे छोड़ दिया। 1939 में उन्होंने मद्रास जाकर मारिया मोंटेसरी से मोंटेसरी पद्धति की ट्रेनिंग ली और 1940 में लखनऊ के कैंट रोड (नजीराबाद) के एक निजी मकान में महज़ पाँच बच्चों के साथ मोंटेसरी स्कूल खोला। आज भी यह इदारा (विद्यालय) लखनऊ में 'मोंटेसरी इंटर कॉलेज' के नाम से मशहूर है। 14 अक्टूबर 1999 को गाजियाबाद में दुनिया से अलविदा होते हुए उन्होंने इस जहान से हमेशा के लिए नाता तोड़ लिया।
स्रोत-यह लेख अलग-अलग पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों से जानकारी जुटा कर लिखा गया है। हसरत अली शेरपुर जिला मुज़फ्फ़रनगर उत्तर प्रदेश फोन नंबर 8580533689