2024 के भारतीय बजट पर संसद में हुई तीव्र बहस: कर वृद्धि, स्वास्थ्य और शिक्षा पर निवेश
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भारत के संसद में 2024 के बजट पर हुई तीव्र बहस में कर वृद्धि, स्वास्थ्य और शिक्षा पर बड़े निवेश की घोषणा हुई। विपक्ष ने इस बजट को असमान और सामाजिक सुरक्षा की कमी के लिए आलोचना की।
भारत के संसद में 2024 के वित्तीय वर्ष के लिए बजट पर चर्चा के दौरान राजनीतिक दलों के बीच तीव्र बहस हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अप्रैल 2024 को बजट का प्रारूप पेश किया, जिसमें 3.5 लाख करोड़ रुपये का कुल व्यय और 2.3 लाख करोड़ रुपये का राजस्व प्रस्तावित किया गया। इस बजट में स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर विशेष जोर दिया गया, जबकि कर सुधार और विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए नई नीतियाँ प्रस्तुत की गईं। विपक्षी दलों ने इस प्रस्ताव को आर्थिक विकास के असमान वितरण के रूप में खारिज कर दिया, और उन्होंने बजट में सामाजिक सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधानों की मांग की। इस बहस का केंद्र बिंदु कर नीति और श्रम कानूनों के परिवर्तन पर था, जिसे संसद में 10 मिनट के भीतर ही चर्चा के लिए बुलाया गया। बजट की घोषणा के बाद से ही आर्थिक विशेषज्ञों और राजनेताओं के बीच चर्चा तेज हो गई है। 2023-24 के आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, भारत की जीडीपी 7.5% की दर से बढ़ी, जबकि मुद्रास्फीति 5.2% पर स्थिर रही। इस वर्ष के बजट में 1.8% की कर वृद्धि और 3% की पूंजीगत व्यय में वृद्धि का प्रस्ताव है, जो कि पिछली सरकार के 2% कर वृद्धि और 2.5% पूंजीगत व्यय से अधिक है। इस बदलाव का उद्देश्य आर्थिक विकास को और तेज करना और रोजगार सृजन को बढ़ावा देना है। प्रधानमंत्री ने बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र में 5,000 करोड़ रुपये का निवेश घोषित किया, जिसमें ग्रामीण अस्पतालों के लिए 1,200 करोड़ रुपये और शहरी अस्पतालों के लिए 2,800 करोड़ रुपये का आवंटन शामिल है। शिक्षा क्षेत्र में 3,500 करोड़ रुपये का निवेश, विशेष रूप से डिजिटल शिक्षा और पाठ्यक्रम सुधार पर केंद्रित है। इसके अतिरिक्त, सरकार ने 2,000 करोड़ रुपये का निवेश स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में किया है, जिससे 5,000 नई नौकरियाँ सृजित होने की उम्मीद है। विपक्षी दलों ने बजट के कर वृद्धि भाग को 'असमान' कहा और यह दावा किया कि यह आम जनता पर बोझ बढ़ाएगा। उन्होंने विशेषकर श्रमिक वर्ग के लिए न्यूनतम वेतन में 5% वृद्धि और कृषि क्षेत्र में 10% सब्सिडी की मांग की। इसके अलावा, उन्होंने बजट में सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए 1,200 करोड़ रुपये के प्रावधान की कमी को उजागर किया, और यह बताया कि इससे सामाजिक असमानता बढ़ेगी। विपक्ष ने इस बजट को 'राजनीतिक अधूरी योजना' के रूप में भी आलोचना की। इस बजट ने सरकार के लिए एक राजनीतिक चुनौती पैदा की है, क्योंकि यह आर्थिक सुधारों के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा पर भी दबाव डालता है। प्रधानमंत्री के समर्थन में 55% मतदाता इस बजट को स्वीकार कर रहे हैं, जबकि विपक्ष के समर्थक 45% मतदाता इसे अस्वीकार कर रहे हैं। इस विभाजन के कारण आगामी चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार बजट में सामाजिक सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं करती, तो उसे जनता के बीच असंतोष का सामना करना पड़ेगा। आर्थिक विशेषज्ञ डॉ. सुष्मिता शर्मा ने कहा कि बजट में प्रस्तावित 3% पूंजीगत व्यय वृद्धि से 1.2 करोड़ नौकरियाँ सृजित होंगी, परंतु यह भी बताया कि कर वृद्धि के कारण छोटे व्यवसायों पर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि डिजिटल शिक्षा पर निवेश से भविष्य में भारत की मानव पूंजी में सुधार संभव है। दूसरी ओर, राजनैतिक वैज्ञानिक प्रोफेसर राजेंद्र ने बताया कि बजट के सामाजिक सुरक्षा के प्रावधानों की कमी से ग्रामीण इलाकों में असमानता बढ़ेगी। इस प्रकार, 2024 का बजट न केवल आर्थिक नीतियों को आकार देगा, बल्कि आने वाले चुनावों में राजनीतिक परिदृश्य पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा।