भारत में गैर‑संचारी रोगों का बढ़ता बोझ और सरकारी स्वास्थ्य पहल
City News Mumbai••0 व्यूज़•2 मिनट पढ़ें
भारत में गैर‑संचारी रोगों की बढ़ती दर ने सार्वजनिक स्वास्थ्य को चुनौती दी है। सरकार ने आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य एवं वेलनेस सेंटरों का विस्तार किया है, जिससे रोग रोकथाम में सुधार की उम्मीद है।
देश के स्वास्थ्य परिदृश्य में 2023 में गैर‑संचारी रोगों (एनसीडी) का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 74 मिलियन लोग मधुमेह से ग्रस्त हैं, जबकि 230 मिलियन से अधिक लोग उच्च रक्तचाप का सामना कर रहे हैं। इन रोगों की व्यापकता ने स्वास्थ्य प्रणाली पर आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ा दिया है, जिससे रोग रोकथाम और समय पर उपचार की आवश्यकता अधिक तीव्र हो गई है।
सरकार ने इस चुनौती का सामना करने के लिए आयुष्मान भारत स्वास्थ्य एवं वेलनेस सेंटर (HWCs) की योजना को तेज़ किया है। 2023 के अंत तक, 150,000 HWCs स्थापित किए जा चुके हैं, जिसका लक्ष्य 2025 तक 200,000 तक पहुंचना है। ये केंद्र प्राथमिक देखभाल, रोग स्क्रिनिंग और जीवनशैली परामर्श प्रदान करते हैं, जिससे रोगियों को शुरुआती चरण में ही पहचान और उपचार मिल सके।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सहयोग से, राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन ने इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड (EHR) को सभी सार्वजनिक अस्पतालों में लागू किया है। इस पहल से रोगियों की जानकारी एकत्रित, विश्लेषित और समय पर साझा की जा रही है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच में सुधार हो रहा है। साथ ही, टेलीमेडिसिन सेवाओं के विस्तार ने ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों तक पहुंच को आसान बनाया है।
सामुदायिक स्तर पर, कई गैर‑सरकारी संगठनों ने पोषण, शारीरिक गतिविधि और धूम्रपान नियंत्रण के प्रति जागरूकता कार्यक्रम चलाए हैं। 2023 में आयोजित एक सर्वेक्षण ने दिखाया कि इन कार्यक्रमों में भाग लेने वाले 68% लोगों ने अपने जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन किए हैं, जिससे रक्त शर्करा और रक्तचाप के स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
भविष्य की ओर देखते हुए, स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2024-2029 के बीच गैर‑संचारी रोगों की रोकथाम के लिए एक राष्ट्रीय रणनीति तैयार की है, जिसमें स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा, कार्यस्थलों पर फिटनेस कार्यक्रम और टैक्स प्रोत्साहन के माध्यम से स्वस्थ आहार को बढ़ावा देना शामिल है। इन बहु‑स्तरीय प्रयासों के सफल कार्यान्वयन से भारत में स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार की संभावना उज्ज्वल दिख रही है।