भारत में गैर‑संचारी रोगों का बढ़ता बोझ: सरकारी उपाय और भविष्य की दिशा
City News Mumbai••0 व्यूज़•3 मिनट पढ़ें
गैर‑संचारी रोगों (NCDs) का भारत में तीव्र प्रसार सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर चुनौती पेश कर रहा है। सरकार ने कई पहलें शुरू की हैं, पर प्रभावी परिणामों के लिए व्यापक सहयोग आवश्यक है।
भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र आज एक नई चुनौती का सामना कर रहा है – गैर‑संचारी रोगों (NCDs) का तीव्र प्रसार। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2019 में कुल रोग‑मृत्यु का लगभग 60 % हिस्सा इन रोगों से जुड़ा था, जिसमें हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और श्वसन रोग प्रमुख हैं। यह प्रवृत्ति न केवल स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव बढ़ा रही है, बल्कि आर्थिक उत्पादकता में भी गिरावट का कारण बन रही है।
वृद्धावस्था की बढ़ती आयु, शहरीकरण, जीवनशैली में परिवर्तन और असंतुलित आहार इन रोगों के प्रमुख जोखिम कारक माने जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 ने इन समस्याओं को पहचानते हुए 2025 तक NCD‑संबंधी मृत्यु दर को 25 % तक घटाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारें विभिन्न स्तरों पर नीतिगत कदम उठा रही हैं।
पहला कदम है ‘राष्ट्रीय NCD नियंत्रण कार्यक्रम’ (NPCDCS) का विस्तार, जिसके तहत 2022 में 1000 से अधिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को स्क्रीनिंग, परामर्श और प्रारम्भिक उपचार की सुविधा प्रदान की गई। इस कार्यक्रम के तहत रक्तचाप, रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच को अनिवार्य किया गया है, जिससे रोग की प्रारम्भिक पहचान संभव हो रही है।
दूसरी पहल ‘हेल्थ इन्फॉर्मेटिक्स फ्रेमवर्क’ (HIF) है, जो डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड, टेलीमेडिसिन और मोबाइल स्वास्थ्य (mHealth) एप्लिकेशन के माध्यम से रोगियों को सतत निगरानी प्रदान करता है। इस ढांचे के तहत 2023 में 5 करोड़ से अधिक नागरिकों ने अपने स्वास्थ्य डेटा को मोबाइल ऐप में दर्ज किया, जिससे डॉक्टरों को रीयल‑टाइम में जोखिम संकेत मिलते हैं।
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है सार्वजनिक जागरूकता अभियान। ‘स्वस्थ भारत, स्वस्थ भविष्य’ अभियान के तहत स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थलों में स्वास्थ्य शिक्षा को अनिवार्य किया गया है। विशेष रूप से किशोर वर्ग में शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देने के लिए खेल सुविधाओं का निर्माण और पोषण संबंधी सलाह दी जा रही है।
इन सभी प्रयासों के बावजूद चुनौतियां बनी हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, योग्य स्वास्थ्य कर्मियों की कमी और सामाजिक-आर्थिक असमानताएं प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा बनती हैं। WHO की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण भारत में केवल 30 % ही लोगों को आवश्यक NCD‑स्क्रीनिंग मिल पाती है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह प्रतिशत 65 % तक पहुंचता है।
भविष्य की दिशा में विशेषज्ञों का मानना है कि बहु‑क्षेत्रीय सहयोग आवश्यक है। स्वास्थ्य मंत्रालय, शिक्षा विभाग, कृषि विभाग और नगर नियोजन एजेंसियों को मिलकर पोषक‑संतुलित आहार, शारीरिक व्यायाम और धूम्रपान नियंत्रण के लिए एकीकृत नीतियां बनानी चाहिए। साथ ही, निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करके नवाचार‑आधारित समाधान, जैसे कि AI‑संचालित रोग भविष्यवाणी मॉडल और कम लागत वाले निदान उपकरण, को त्वरित रूप से अपनाया जा सकता है।
संक्षेप में, गैर‑संचारी रोगों का बढ़ता बोझ भारत के स्वास्थ्य परिदृश्य को पुनः आकार दे रहा है। सरकारी नीतियां, डिजिटल पहल और जागरूकता कार्यक्रम इस चुनौती का सामना करने के मुख्य स्तंभ हैं, परन्तु सतत सफलता के लिए व्यापक सामाजिक भागीदारी और निरंतर निवेश अनिवार्य है।