भारत में टाइप 2 डायबिटीज प्रबंधन के लिए नई राष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी
City News Mumbai••0 व्यूज़•2 मिनट पढ़ें
स्वास्थ्य मंत्रालय ने टाइप 2 डायबिटीज के निदान, उपचार और निगरानी के लिए अद्यतन राष्ट्रीय दिशानिर्देश जारी किए। इन दिशानिर्देशों में रोगी शिक्षा, दवा प्रबंधन और जीवनशैली हस्तक्षेप पर नया जोर दिया गया है।
भारत में टाइप 2 डायबिटीज की प्रचलन दर 2023 में 77 मिलियन से अधिक होने का अनुमान है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वैश्विक भार का 70% से अधिक है। इस महामारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने 15 अगस्त 2024 को राष्ट्रीय डायबिटीज प्रबंधन के लिए नवीनतम दिशानिर्देश जारी किए।
इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य चिकित्सकों, रोगियों और नीति निर्माताओं के बीच एक समन्वित दृष्टिकोण स्थापित करना है। प्रमुख बदलावों में रोगी शिक्षा के लिए एक संरचित मॉड्यूल, दवा संयोजन के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल और रोग प्रगति के निगरानी हेतु डिजिटल टूल्स का समावेश शामिल है।
मुख्य बिंदु: 1. **निदान मानदंड** – फास्टिंग ब्लड शुगर ≥ 100 mg/dl या HbA1c ≥ 5.7% पर डायबिटीज की पुष्टि। 2. **पहला कदम** – आहार एवं शारीरिक गतिविधि में परिवर्तन, 3–6 माह के भीतर दवा शुरू करने पर विचार। 3. **दवा प्रबंधन** – मेटफॉर्मिन को प्रथम पंक्ति दवा के रूप में प्राथमिकता, आवश्यकता अनुसार SGLT‑2 इनहिबिटर या GLP‑1 एगोनिस्ट जोड़ना। 4. **निगरानी** – HbA1c हर 3–6 माह, रक्तचाप और LDL‑कोलेस्ट्रॉल का वार्षिक मूल्यांकन। 5. **रोगी शिक्षा** – रोगियों को स्वयं प्रबंधन के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से सशक्त बनाना।
मंत्री स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के अधिकारी, डॉ. राजेश कुमार ने कहा, "ये दिशानिर्देश रोगियों को समय पर उपचार और जीवनशैली में बदलाव के लिए प्रेरित करेंगे, जिससे जटिलताओं की घटना घटेगी।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि सरकार ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर इन मानकों को लागू करेगी।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से टाइप 2 डायबिटीज के प्रबंधन में सुधार होगा और रोगियों की जीवन गुणवत्ता बढ़ेगी। हालांकि, कुछ चिकित्सक ने चेतावनी दी है कि दवा संयोजन का निर्णय व्यक्तिगत रोगी की परिस्थितियों पर आधारित होना चाहिए।
अंततः, ये दिशानिर्देश भारत को विश्व के अग्रणी स्वास्थ्य प्रणालियों में शामिल करने का एक महत्वपूर्ण कदम हैं, जो न केवल रोगियों को लाभान्वित करेगा बल्कि स्वास्थ्य देखभाल लागत में भी कमी लाने की उम्मीद है।