मनोज जरांगें की भाषा पर मंत्रिमंडल में संताप........?
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आंदोलन के आड़ में राजनीति...... महायुती के मंत्रियों का सवाल........!
अब “लाड़ देना बंद करो” ऐसा बैठक में स्वर.....
मुंबई,दि.१५ (अनंत नलावडे)‑ राज्य में मराठा आरक्षण की मांग के लिये फिर से मुंबई आने की जिद्द से आंदोलन की तैयारी करने वाले मनोज जरांगे‑पटील के खिलाफ मंगलवार को खुद राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में नाराज़गी और संताप का स्वर उभरा। मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्री और अन्य राजनीतिक नेताओं के बारे में जरांगे द्वारा उपयोग की जाने वाली आपत्तिजनक भाषा के साथ ही आंदोलन के माध्यम से ली जा रही राजनीतिक भूमिका पर भी कुछ मंत्रियों ने तीव्र आपत्ति दर्ज की। क्योंकि पहले ही महायुती सरकार ने मराठा समाज के लिये कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये थे, फिर भी लगातार सरकार को ही लक्ष्य क्यों बनाया जा रहा है…? ऐसा ही संतप्त सवाल बैठक में उपस्थित किया गया, ऐसा समझा जाता है।
उसमें मुख्यतः मराठा आरक्षण सहित विभिन्न मांगों पर सरकार ने कानूनी और संवैधानिक ढाँचे में निर्णय लिये थे, जबकि अनावश्यक न्याय‑प्रविष्ट विषयों पर दबाव के बजाय संवाद और कानूनी मार्ग ही विकल्प होने का कुछ मंत्रियों ने स्पष्ट किया। इसमें मुख्यतः “सगेसोयर” सहित कुछ मांगें इस न्यायालयीन कसौटी पर टिकने का प्रश्न है। इसलिए सरकार द्वारा भी यदि जल्दबाजी में कोई निर्णय लिया गया तो उसे न्यायालय में चुनौती मिल सकती है और उसका अंतिम असर मराठा समाज को ही हो सकता है, ऐसी भी आग्रही भूमिका बैठक में रखी गई, ऐसा भी कहा गया।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, मंत्री चंद्रशेखर बावनकुळे, संजय शिरसाट सहित महायुती के नेताओं के बारे में जरांगे द्वारा किए गए बयानों पर भी बैठक में नाराज़गी व्यक्त की गई। इसलिए यद्यपि आंदोलन का अधिकार मान्य है, फिर भी लोकप्रतिनिधियों के प्रति भाषा और आंदोलन की दिशा में कुछ सीमाएँ होनी चाहिए, ऐसा एक स्वर मंत्रियों ने लगाया।
विशेष बात यह है कि मुंबई में गणेशोत्सव के दौरान ही आंदोलन होने वाला है, जिससे उत्पन्न होने वाले ट्रैफ़िक, भीड़ और कानून‑व्यवस्था के प्रश्नों पर भी चर्चा हुई। क्योंकि इस त्योहार में देश‑विदेश से लाखों भक्त मुंबई आते हैं, और आंदोलन से गणेशभक्त और सामान्य नागरिकों की असुविधा न हो, इसकी जिम्मेदारी आंदोलनकारियों पर भी है, यह सरकार ने स्पष्ट किया है।
अब फडणवीस सरकार ने क्या किया…?
तो महाराष्ट्र में पहली बार २०१४ में देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री रहते हुए मराठा समाज को आरक्षण देने का निर्णय हुआ। आगे न्यायालयीन प्रक्रिया में वह आरक्षण रद्द हुआ। इसके बाद महायुती सरकार ने विशेष अधिवेशन बुलाकर मराठा समाज को १० % स्वतंत्र आरक्षण देने का भी निर्णय लिया। तब से इस आरक्षण का लाभ मराठा समाज के विद्यार्थी और युवाओं को मिल रहा है, यह सरकार का दावा है। इसके अलावा कुटुंबीय रिकॉर्ड वाले मराठा नागरिकों को प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया के लिये विशेष न्यायाधीश शिंदे समिति गठित की गई। इस प्रक्रिया में भी लाखों नागरिकों को प्रमाणपत्र प्रदान किए जाने की सरकार ने सूचना दी है। इसलिए “सरकार ने क्या किया”…? इस प्रश्न का उत्तर भी सरकार ने निर्णयों की सूची के रूप में दिया है…; परंतु जरांगे के आंदोलन से आरक्षण का मुद्दा फिर से राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में आ गया है।
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का जरांगे को सीधे सबुरी का संदेश…!
दरम्यान, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी जरांगे को गणेशोत्सव की पृष्ठभूमि में संयम रखने का आह्वान किया। उन्होंने यह भी कहा कि मराठा समाज की न्यायसंगत मांगों के प्रति सरकार शुरू से ही सकारात्मक रही है और एक ओर मराठा समाज को न्याय देते हुए ओबीसी या किसी अन्य समाज पर अन्याय नहीं होगा, यह सरकार की भूमिका है। उन्होंने कई बार यह स्पष्ट किया। इस बीच खुद मुख्यमंत्री, मंत्री, जिला अधिकारी, पुलिस अधीक्षक और शासन के प्रतिनिधि निरंतर जरांगे से संवाद कर रहे हैं। कुछ विषय न्याय‑प्रविष्ट होने के कारण उन्हें कानूनी और संवैधानिक ढाँचे में सुलझाने के लिये सरकार तैयार है। यदि सरकार चार कदम आगे बढ़े तो आंदोलनकारियों को भी सकारात्मक भूमिका लेनी चाहिए, ऐसा आह्वान शिंदे ने किया। परंतु जिद्दी जरांगे किसी की बात सुनने की मनस्थिति में नहीं हैं। इसमें यह भी कहा गया कि गणेशोत्सव में देश‑विदेश से लाखों भक्त मुंबई आते हैं। इसलिए आंदोलन का अधिकार हो तो भी सामान्य नागरिक और गणेशभक्तों की असुविधा न हो, इसका ध्यान आंदोलनकारियों को रखना चाहिए, उन्होंने यह भी कहा।
यदि इस सारी घटनाओं को बारीकी से राजनीतिक अर्थ में समझा जाए तो एक बात स्पष्ट होती है कि जरांगे के आंदोलन को अब तक प्रशासनिक और सामाजिक प्रश्न का चेहरा माना गया था। परंतु अब महायुती सरकार के निर्णयों पर आलोचना, नेताओं पर व्यक्तिगत बयानों और गणेशोत्सव के दौरान मुंबई में आंदोलन के कारण संघर्ष को स्पष्ट राजनीतिक रंग मिलने की संभावना है। इसमें आगामी स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के चुनावों की पृष्ठभूमि में मराठा मतदाताओं में किसकी बाज़ी मजबूत हो रही है और आंदोलन की राजनीतिक दिशा किस पार्टी को लाभ‑हानि दे रही है, इस पर भी महायुती और विरोधियों का ध्यान गया है।