“UPI” मुफ्त से “MDR” तक… डिजिटल क्रांतीची किंमत कौन अदा करेगा?
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‘कैशलेस’ का आग्रह, आज शुल्क की बारी… व्यापारी की जेब से निकलने वाला पैसा आखिर जाएगा कहां?
मीरा भायंदर, दि. 17 सितंबर (सिटी न्यूज़ मुंबई अनंत नलावडे)
भारत में डिजिटल भुगतान की तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदली है। चाय की दुकान से लेकर बड़े मॉल तक QR कोड पहुंचा और मोबाइल से भुगतान करना आम नागरिक की रोजमर्रा की आदत बन गया। अब इसी व्यवस्था में 15 अक्टूबर 2026 से चुनिंदा बड़े व्यापारी UPI लेनदेन पर Merchant Discount Rate (MDR) लागू होने जा रहा है।
नई व्यवस्था के अनुसार, ₹2,000 से अधिक के पात्र Person-to-Merchant (P2M) UPI लेनदेन पर 0.4% MDR लगेगा। ₹75,000 या उससे अधिक के लेनदेन पर यह शुल्क अधिकतम ₹300 प्रति लेनदेन तक सीमित रहेगा। व्यक्ति से व्यक्ति यानी P2P भुगतान इस शुल्क के दायरे में नहीं होंगे और ₹2,000 तक के पात्र P2M भुगतान भी MDR से बाहर रहेंगे।
रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे कुछ क्षेत्रों में ₹2,000 से अधिक के पात्र लेनदेन पर ₹5 का फ्लैट MDR रखा गया है। वहीं म्यूचुअल फंड, सिक्योरिटीज, स्टॉकब्रोकर और डीलर से जुड़े पूंजी बाजार लेनदेन के लिए 0.02% MDR, अधिकतम ₹300 का प्रावधान बताया गया है।
ग्राहक से पैसा नहीं, फिर सवाल व्यापारी पर क्यों?
केंद्र सरकार का कहना है कि MDR ग्राहक से सीधे नहीं लिया जाएगा। यह भुगतान व्यवस्था में शामिल बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडरों और UPI ऐप प्रदाताओं के बीच वितरित होने वाला शुल्क है। सरकार का तर्क है कि UPI के बढ़ते विस्तार, साइबर सुरक्षा, तकनीकी बुनियादी ढांचे और भविष्य के विकास के लिए भुगतान व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना जरूरी है।
लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
जब MDR व्यापारी को देना है और वह ग्राहक से सीधे वसूल नहीं सकता, तो इस अतिरिक्त लागत का अंतिम आर्थिक असर कहां पड़ेगा? क्या व्यापारी इसे अपने मुनाफे से वहन करेगा? क्या प्रतिस्पर्धी बाजार में कुछ व्यापारी लागत को स्वीकार करेंगे और कुछ अन्य तरीके से इसकी भरपाई करने की कोशिश करेंगे? इन सवालों का वास्तविक जवाब नई व्यवस्था लागू होने के बाद बाजार के व्यवहार से सामने आएगा।
यानी मुद्दा सिर्फ 0.4 प्रतिशत का नहीं, बल्कि इस बात का है कि डिजिटल भुगतान की लागत आखिर किस आर्थिक पक्ष पर पड़ेगी।
‘UPI टैक्स’ या MDR?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। सरकार और NPCI इसे UPI पर लगाया गया टैक्स नहीं, बल्कि चुनिंदा व्यापारी लेनदेन पर MDR बता रहे हैं। MDR से मिलने वाली राशि भुगतान व्यवस्था से जुड़े प्रतिभागियों के बीच वितरित होगी।
विपक्ष की ओर से इस फैसले पर राजनीतिक सवाल उठाए गए हैं। कांग्रेस ने इसे ‘UPI टैक्स’ बताते हुए केंद्र की आलोचना की है और विदेशी दबाव का आरोप भी लगाया है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने विदेशी दबाव के आरोप को खारिज करते हुए कहा है कि UPI से जुड़े नीतिगत फैसले भारत स्वतंत्र रूप से लेता है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर विदेशी दबाव का आरोप एक राजनीतिक दावा है, जिसकी पुष्टि करने वाला कोई सार्वजनिक आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है।
फायदा और संभावित चिंता—दोनों पहलू
नई व्यवस्था का घोषित उद्देश्य UPI पारिस्थितिकी तंत्र को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना है। सरकार के अनुसार MDR से मिलने वाली राशि भुगतान व्यवस्था, सुरक्षा और तकनीकी विकास को समर्थन दे सकती है। साथ ही छोटे लेनदेन और P2P भुगतान को शुल्क से बाहर रखा गया है।
दूसरी ओर, व्यापारी संगठनों और कुछ उद्योग प्रतिनिधियों ने लागत बढ़ने को लेकर चिंता जताई है। Reuters के अनुसार Retailers Association of India सहित कुछ संगठनों ने आशंका व्यक्त की है कि अतिरिक्त लागत से कम मार्जिन वाले कारोबार प्रभावित हो सकते हैं और कुछ व्यापारी नकद भुगतान की ओर लौटने पर विचार कर सकते हैं।
निष्कर्ष: सवाल सिर्फ 0.4% का नहीं, भरोसे का भी है
UPI ने भारत में भुगतान की आदतों को बदल दिया है। अब जब बड़े व्यापारी लेनदेन पर MDR की व्यवस्था आ रही है, तो सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता और नीति की स्थिरता का रहेगा।
व्यापारी पर पड़ने वाली लागत कितनी होगी, उसका असर बाजार में किस रूप में दिखाई देगा और UPI के बुनियादी ढांचे तथा सुरक्षा पर इस राशि का कितना उपयोग होगा—इन सवालों पर स्पष्ट जानकारी महत्वपूर्ण होगी।
**डिजिटल भारत की ताकत केवल QR कोड नहीं, बल्कि उस पर लोगों और कारोबारियों का भरोसा भी है। आने वाले समय में 0.4% MDR से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि यह नई व्यवस्था डिजिटल भुगतान के विस्तार और व्यापारी वर्ग की लागत के बीच किस तरह का संतुलन बनाती है।**