भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का नया मोड़: 2024 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का कार्यान्वयन
City News Mumbai••0 व्यूज़•3 मिनट पढ़ें
नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत 2.5 ट्रिलियन रुपये के बजट के साथ डिजिटल स्वास्थ्य पहचान, टेलीमेडिसिन और आयुष्मान भारत को सुदृढ़ किया जाएगा, जबकि कार्यबल की कमी और ग्रामीण पहुँच जैसी चुनौतियों को भी संबोधित किया जाएगा।
भारत में स्वास्थ्य सेवा का परिदृश्य 2024 में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के कगार पर है। पिछले दो दशकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य में निवेश में निरंतर वृद्धि के बावजूद, असमानता, किफायती देखभाल तक पहुँच की कमी और बुनियादी सुविधाओं की अपर्याप्तता प्रमुख चुनौतियों के रूप में बनी हुई थीं। नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP) का कार्यान्वयन, जो 1 अप्रैल 2024 से प्रभावी हुआ, इन मुद्दों को हल करने के लिए व्यापक रणनीतियों को सम्मिलित करता है। नीति का मुख्य लक्ष्य सभी नागरिकों को गुणवत्ता‑पूर्ण, सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना है, जिससे जीवन प्रत्याशा और रोग‑मुक्ति में सुधार हो सके। और सामाजिक कल्याण में भी सकारात्मक बदलाव लाने की आशा है।
2022‑23 वित्तीय वर्ष में भारत ने कुल घरेलू उत्पाद (GDP) का 4.5 % स्वास्थ्य पर खर्च किया, जो विश्व औसत 9.8 % से काफी कम है। उसी अवधि में औसत जीवन प्रत्याशा 69.8 वर्ष रही, जबकि ग्रामीण‑शहरी अंतर 6 वर्ष से अधिक था। गैर‑संचारी रोगों ने कुल रोग भार का 62 % हिस्सा बनाया, जिससे रोग‑निवारण पर ध्यान आवश्यक हो गया।
नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति ने 2024‑2028 की अवधि में स्वास्थ्य बजट को 2.5 ट्रिलियन रुपये बढ़ाने की घोषणा की। इस राशि का 40 % प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के आधुनिकीकरण, 30 % डिजिटल स्वास्थ्य पहचान (Health ID) के विस्तार, और 20 % टेलीमेडिसिन नेटवर्क के निर्माण में आवंटित किया जाएगा। शेष 10 % अनुसंधान, मानव संसाधन प्रशिक्षण और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली को समर्थन देगा।
आयुष्मान भारत योजना के तहत 2024 में 12 कोटि करोड़ लाभार्थियों को पोषण‑सुरक्षित अस्पताल सेवाएँ प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही, 2025 तक सभी 1.5 लाख सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड (EMR) स्थापित करने की योजना है, जिससे रोगी डेटा का राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत प्रबंधन संभव हो सकेगा। टेलीहेल्थ सेवाओं को 3 घंटे‑प्रति‑दिन उपलब्ध कराकर दूरस्थ क्षेत्रों में विशेषज्ञ परामर्श को सुलभ बनाया जाएगा।
इन पहलों के बावजूद, स्वास्थ्य कार्यबल की कमी एक प्रमुख बाधा बनी हुई है; 2023 के आंकड़ों के अनुसार प्रति 1 000 जनसंख्या पर केवल 2.3 चिकित्सक उपलब्ध हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, आय‑समानता, और डेटा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ भी नीति के सफल कार्यान्वयन में जोखिम उत्पन्न करती हैं। वित्तीय पारदर्शिता और निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करना आवश्यक है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रमुख डॉ. अंजली सिंह ने कहा कि ‘डिजिटल स्वास्थ्य पहचान और टेलीमेडिसिन का समाकलन रोगी देखभाल में गति और सटीकता लाएगा’। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के भारत क्षेत्रीय प्रतिनिधि ने भी इस नीति को ‘सभी आय वर्गों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम’ के रूप में सराहा।
प्रकाशित प्रक्षेपण के अनुसार, 2028 तक स्वास्थ्य कवरेज 80 % तक पहुंचने की उम्मीद है, जबकि मातृ मृत्यु दर में 30 % की कमी और नवजात मृत्यु दर में 25 % की गिरावट की लक्ष्यीकरण किया गया है। इन संकेतकों में सुधार न केवल जनसंख्या स्वास्थ्य को बल्कि आर्थिक उत्पादकता को भी बढ़ावा देगा, क्योंकि स्वस्थ कार्यबल उत्पादनशीलता में 1 % वृद्धि के साथ जीडीपी में 0.5 % अतिरिक्त वृद्धि का अनुमान है।
सभी हितधारकों के सहयोग और सतत निगरानी के साथ, नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति भारत को एक अधिक समावेशी और सुदृढ़ स्वास्थ्य प्रणाली की ओर अग्रसर कर सकती है, जिससे भविष्य में रोग‑निवारण और उपचार दोनों में संतुलित प्रगति संभव होगी।