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दिल्ली का दरबार सीधे गुजरात की दारी....?
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दिल्ली का दरबार सीधे गुजरात की दारी....?

City News Mumbai•11 सितंबर 2026 को 04:16 am बजे•0 व्यूज़•5 मिनट पढ़ें

७२ साल की राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की परंपरा तोड़कर केवाड़ में समारोह......; "गुजरात ही क्यों"...?

मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे का केंद्र को घातक सवाल.........!

कलाकारों को राज ठाकरे का आह्वान—अब भी आवाज उठाओ......!

मुंबई, दि.१०(अनंत नलावडे)- देश की राजधानी में सात दशक से अधिक समय से जड़ित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की परंपरा अचानक गुजरात के "केवाड़िया" में ले जाने की जरूरत क्या....? यह प्रश्न उठाते हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने गुरुवार को केंद्र में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व पर बोचरी शब्दों में हमला किया है। "राष्ट्रीय" नाम की हर चीज़ का पता धीरे-धीरे गुजरात की ओर क्यों मुड़ रहा है....? ऐसा सवाल करते हुए उन्होंने यह केवल एक पुरस्कार समारोह के स्थान का विषय नहीं बल्कि देश के सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्रबिंदु के बारे में गंभीर प्रश्न है, यह भी कड़वे शब्दों में उल्लेख कर अपना गुस्सा व्यक्त किया।

"गुजरात ही क्यों".....? तो यह साधा प्रश्न है...! यदि पुरस्कार समारोह दिल्ली के बाहर करना हो तो मुंबई क्यों नहीं....? भारतीय फिल्म उद्योग के जनक दादासाहेब फाल्के का महाराष्ट्र क्यों नहीं....? देश में प्रभावी फिल्म उद्योग वाले तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का विचार क्यों नहीं....? केवल केवाड़िया क्यों....? ऐसा स्पष्ट और कठोर सवाल ठाकरे ने उठाया।

देश के फिल्म इतिहास में महाराष्ट्र का योगदान निर्विवाद है, फिर भी राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह को महाराष्ट्र में आयोजित करने का अवसर क्यों नहीं दिया जाता, इसका उत्तर सरकार को देना चाहिए, यही उनका मानना है। "राष्ट्रीय" कहो और पता गुजरात दो। कॉमनवेल्थ स्पर्धा गुजरात में, 2023 के क्रिकेट विश्वचषक का अंतिम मैच गुजरात में, विदेशी राष्ट्रप्रमुखों के दौरे में गुजरात को विशेष स्थान, मुंबई से जुड़े आर्थिक महत्व के प्रोजेक्टों के संबंध में गुजरात की ओर झुकते माप जैसे निर्णयों की श्रृंखला देखते हुए देश की हर बड़ी चीज़ का केंद्रबिंदु गुजरात में ही बनाने का प्रयास तो नहीं हो रहा है.....? ऐसा खास राजनैतिक सवाल ठाकरे ने अपनी ठाकरी शैली में उठाया।

उनके अनुसार, भारत की प्रगति किसी एक राज्य की मक्तेदारी नहीं है। कई पीढ़ियों के त्याग, देश के प्रत्येक प्रांत के श्रम, उद्योग, कला, संस्कृति और योगदान पर यह देश खड़ा है। इसलिए यदि किसी राज्य को बार-बार राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रमों का मंच देकर उससे अलग राजनैतिक संदेश बनाने का प्रयास किया जाता है, तो उस पर प्रश्न उठाना आवश्यक है, यह भी ठाकरे ने इस बार ज़रूर कहा।

"इतिहास बनाना है या इतिहास की जगह बदलनी है"......?

"यदि स्वयं कुछ निर्माण नहीं कर पाए तो नाम बदलो, स्थान बदलो और उससे नया इतिहास बनाओ," ऐसी बोचरी टीका करते हुए ठाकरे ने स्पष्ट किया कि देश के इतिहास की महत्वपूर्ण संस्थाओं, परम्पराओं और राष्ट्रीय कार्यक्रमों को भौगोलिक राजनीति की फ्रेम में ढाल दिया जाए तो कल "राष्ट्रीय" शब्द का अर्थ भी बदलने का डर उन्होंने व्यक्त किया। आज पुरस्कार केवाड़िया में.....; कल राष्ट्रीय पुरस्कारों के लिए गुजरात में स्थान होना ही मानदंड रहेगा क्या....? ऐसा उपरोधिक सवाल भी उन्होंने किया।

राजनीतिक अर्थ | "गुजरात मॉडल" का सांस्कृतिक विस्तार.....?

यह विवाद केवल फिल्म पुरस्कार तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। बल्कि आर्थिक निवेश, खेल, अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम और अब सांस्कृतिक क्षेत्र में राष्ट्रीय मंचों में गुजरात को मिलने वाले प्राथमिकता की राजनीतिक प्रस्तुति विरोधियों द्वारा की जा सकती है। देश की आर्थिक और सांस्कृतिक वैभव को किसी एक राज्य के नाम पर लिखने का प्रयास हो रहा है क्या...? यह प्रश्न भी महाराष्ट्र और दक्षिणी राज्यों के लिए विशेष संवेदनशील हो सकता है। फिर भी, पुरस्कार समारोह को "केवाड़िया" में ले जाने के पीछे केंद्र सरकार का आधिकारिक कारण क्या है, यह स्पष्ट होना उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए ठाकरे द्वारा उठाए गए राजनीतिक प्रश्न को सरकार के स्पष्टीकरण से भी जोड़ना आवश्यक है।

कलाकारों, अब भी अपना मुख खोलो.....!

राज ठाकरे ने इस मामले में देश भर के कलाकारों से भूमिका लेने का आह्वान किया है। सरकार के स्तुति गीत गाने के लिए कलाकार तत्पर होते हैं.....; लेकिन सांस्कृतिक परम्परा और संस्थागत स्वायत्तता के प्रश्नों पर वे चुप रहते हैं, ऐसी भी टीका उन्होंने की। "मुद्दा केवाड़िया या अन्य शहर नहीं....; बल्कि देश की राजधानी में इस पुरस्कार की जो उज्ज्वल परम्परा है उसे क्यों तोड़ा जा रहा है, इस पर कलाकारों को बोलना चाहिए," ऐसा आह्वान भी राज ठाकरे ने किया। क्योंकि उनके अनुसार, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों ने इस विषय पर दृढ़ भूमिका नहीं ली तो भविष्य में राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक निर्णयों में प्रादेशिक संतुलन का प्रश्न और अधिक गंभीर हो सकता है।

"गुजराती बंधुओं, इन गुदगुलियों को मत भूलो"......!

गुजराती समाज को भी ठाकरे ने सीधे आह्वान किया कि आपके भाषाई नेताओं की सत्ता है इसलिए होने वाली गुदगुली, सत्ता का समय समाप्त होने के बाद भालू की गुदगुली बन सकती है, ऐसा मार्मिक तर्क भी उन्होंने लगाया। उसी समय ऐसी उपद्रव से आगे देश के अन्य प्रांतों के नागरिक और नेता अपने राज्यों, उद्योगों और व्यावसायिक हितों पर पड़ने वाले परिणामों का हिसाब रखेंगे, ऐसा संकेत भी उन्होंने दिया।
“देश गुजरात के विरोध में नहीं है; लेकिन ‘देश मतलब गुजरात’ ऐसी नई व्याख्या कोई करने लगे, तो उससे प्रश्न पूछे ही जाने चाहिए”....!

बॉक्स........

राज ठाकरे के सीधे सवाल...

१. ७२ वर्ष की परम्परा तोड़ने का कारण क्या.....?

२. दिल्ली के बजाय केवल केवाड़ा क्यों...?

३. दादासाहेब फाल्के के महाराष्ट्र को अवसर क्यों नहीं....?

४. दक्षिण की फिल्म उद्योग के योगदान पर विचार क्यों नहीं......?

५. प्रत्येक राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए केवल गुजरात क्यों.....?

अब राज ठाकरे ने आज जो कठोर भूमिका स्पष्ट की, उससे आगे क्या होगा यह प्रश्न उत्पन्न होने के कारण अब इस पर केंद्र का स्पष्टीकरण → कलाकारों की भूमिका → महाराष्ट्र की प्रतिक्रिया → दक्षिणी राज्यों का विरोध → ‘राष्ट्रीय’ कार्यक्रमों के विकेंद्रीकरण की नई चर्चा जैसी कई नई उप‑प्रश्नों की श्रृंखला बन गई है।
राष्ट्रीय पुरस्कारों का प्रश्न केवल “कहाँ”....? इतना ही नहीं; असली सवाल है, “क्यों”....? इसका। और उस “क्यों” का उत्तर कौन देगा.....? यही असली मूल प्रश्न है.
......................... (समाप्त)...............
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