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IIT मुंबई: ... 'अब ज्ञानमंदिर की उत्तरपत्रिका कौन जाँच करेगा' ...?
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IIT मुंबई: ... 'अब ज्ञानमंदिर की उत्तरपत्रिका कौन जाँच करेगा' ...?

City News Mumbai•25 सितंबर 2026 को 11:15 am बजे•3 व्यूज़•6 मिनट पढ़ें

एक समय में दुनिया को भारतीय बुद्धिमत्ता से परिचित कराने वाले IIT ने देश को वैज्ञानिक, उद्योगपति, शोधकर्ता और वैश्विक नेतृत्व दिया; पर आज साहिल वाकोडे मामले ने एक अस्वस्थ करने वाला प्रश्न फिर से मंच पर लाया है।

तो सवाल यह है कि जब हम सामाजिक न्याय, आरक्षण और छात्र अधिकारों को बनाए रखते हैं, तो IIT की शैक्षणिक स्वायत्तता, गुणवत्ता और संस्थागत अनुशासन हम कहाँ खो रहे हैं........? इसका.....

भारत ने IIT को केवल कॉलेज के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की बुद्धिमत्ता की प्रयोगशाला के रूप में स्थापित किया। 1951 में IIT खरगपुर से शुरू हुई यह पहल 1958 में IIT मुंबई तक पहुँच गई। 1961 के कानून से IIT को ‘राष्ट्रीय महत्व की संस्था’ का दर्जा मिला। UNESCO और उस समय के सोवियत संघ के सहयोग से स्थापित IIT मुंबई ने आगे विश्व मानचित्र पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई। कारण

इस संस्था से निकले लोग केवल स्नातक नहीं थे... बल्कि उन्होंने उद्योग, विज्ञान, अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और सार्वजनिक जीवन को दिशा दी। इनमें इन्फोसिस के नंदन नीलेकणी, सलील पारेख, VMware के रघु रघुराम आदि जैसे विश्वविद्यालयों में वैश्विक स्तर पर शोध करने वाले प्रोफेसर और विभिन्न क्षेत्रों के सैकड़ों मान्यवर इस परंपरा के उदाहरण हैं। IIT मुंबई स्वयं अपने पूर्व छात्रों के वैश्विक योगदान का रिकॉर्ड रखता है। तो आज सवाल इतना ही नहीं है कि साहिल वाकोडे की मृत्यु के पीछे वास्तव में क्या हुआ.....? मूल रूप से सवाल उससे बड़ा है कि IIT के ज्ञान मंदिर में आज छात्र, शिक्षक, प्रशासन, सामाजिक न्याय और शैक्षणिक अनुशासन का संबंध ठीक कहाँ खड़ा है........? इसका......

इसलिए, आरक्षण के इतिहास को भी इस चर्चा में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। IIT व्यवस्था में SC/ST छात्रों के लिए विशेष प्रवेश व्यवस्था और छूट की प्रक्रिया 1960 के दशक के उत्तरार्ध से विकसित हुई और 1973 से प्रवेश मानदंडों में महत्वपूर्ण बदलाव लागू हुए। आगे संविधानिक आरक्षण के ढाँचे में SC/ST, फिर OBC और फिर EWS जैसी प्रावधानें केंद्रीय शिक्षण संस्थाओं में लागू हुईं। OBC आरक्षण का कार्यान्वयन केंद्रीय शैक्षणिक संस्थाओं में 2008-09 से शुरू हुआ। लेकिन यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण रेखा खींचनी होगी...... क्योंकि आज भी आरक्षण आया और IIT का दर्जा घटा, यह सीधा निष्कर्ष तथ्यों पर आधारित नहीं है।

क्योंकि आरक्षण ही सामाजिक प्रतिनिधित्व की संविधानिक व्यवस्था है; जबकि IIT की गुणवत्ता प्रवेश की परीक्षा, शिक्षण, अनुसंधान, प्रयोगशाला, प्रोफेसरों की गुणवत्ता, छात्रों की मेहनत और संस्थागत संस्कृति जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए वास्तविक सवाल आरक्षण का नहीं है। वास्तविक सवाल यह है कि हम आरक्षण के साथ गुणवत्ता और शैक्षणिक अनुशासन का संतुलन कितनी सख्ती से बनाए रखे हैं......? इसका

एक और बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय पहचान संस्था के हर सवाल की पहली भाषा बन गई, तो ज्ञान की भाषा पीछे न रह जाए क्या..? और उसी समय दूसरी ओर भी उतनी ही कठोरता से सोचना पड़ेगा कि, यदि जातीय भेदभाव का कोई वास्तविक अनुभव हो, तो केवल ‘IIT में ऐसा हो भी नहीं सकता’ कहकर उसे नकारना क्या सही है.....? इसी दो ध्रुवों के बीच आज IIT जैसी संस्था की सच्ची परीक्षा है। क्योंकि स्वयं IIT मुंबई ने SC/ST सेल, OBC लियाज़न सेल और विभिन्न शिकायत निवारण तंत्र बनाए हैं। संस्था की आधिकारिक नीति में जातीय भेदभाव को कोई स्थान नहीं होने का स्पष्ट उल्लेख है। अर्थात् सामाजिक न्याय और शैक्षणिक उत्कृष्टता परस्पर विरोधी होने की ज़रूरत नहीं है। तो साहिल वाकोडे मामला इतना अस्वस्थ क्यों लगता है......? क्योंकि एक परीक्षा में कथित गैर-प्रक्रिया से शुरू हुआ यह विवाद अब जातीय उत्पीड़न के आरोप, प्रोफेसरों पर कार्रवाई, छात्र आंदोलन, प्रशासन की ज़िम्मेदारी की मांग और संस्था की निर्णय प्रक्रिया तक पहुँच गया है।

IIT ने प्रारंभिक बयान में घटनाक्रम के लिए बाद में खेद व्यक्त करते हुए जांच पूरी होने से पहले निष्कर्षात्मक विवरण प्रस्तुत करना अनुचित होने को स्वीकार किया। प्रो. सूर्यनारायण दुल्ला को डीन के प्रशासनिक पद से हटाया गया....; परंतु वे प्रोफेसर के रूप में बने रहे। छात्रों ने स्वतंत्र जांच के साथ 18 मांगें प्रस्तुत की हैं। इससे एक पाठ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि, अब जब छात्र की परीक्षा ली जाती है, जिस अनुशासन की अपेक्षा की जाती है, वही अनुशासन प्रशासन को भी अपने प्रत्येक बयान में दिखाना चाहिए।

यदि छात्र ने नियम तोड़ा है तो जांच होनी चाहिए। यदि प्रोफेसरों पर आरोप लगे हैं तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि जातीय उत्पीड़न का आरोप है तो उसे साक्ष्य के आधार पर जांचा जाना चाहिए। और यदि छात्र की मृत्यु हुई है तो उसके कारण को घोषणाओं से नहीं, बल्कि जांच से तय किया जाना चाहिए। क्योंकि आरोप दोषसिद्धि नहीं है और आंदोलन अंतिम न्यायालय नहीं है।

और भी बड़ा सवाल है IIT की संस्थागत संस्कृति का.......

जिस संस्था ने विश्वभर भारतीय बुद्धिमत्ता का झेंडा फहराया, वहाँ राजनीतिक दबाव, जातीय ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया ट्रायल या प्रशासन पर अविश्वास बढ़ता गया, तो उसका फटका किस पर पड़ेगा.....? वह सबसे पहले छात्रों पर पड़ेगा। फिर शिक्षकों पर। और अंत में IIT के नाम पर। इसलिए आज IIT को आरक्षण से बचने की नहीं, बल्कि आरक्षण के साथ गुणवत्ता को और मजबूत करने की जरूरत है। जातीय भेदभाव के खिलाफ शून्य सहनशीलता चाहिए। उसी समय शैक्षणिक गैर-प्रकार के खिलाफ भी शून्य सहनशीलता चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए मजबूत व्यवस्था भी चाहिए। परंतु उसी समय शिक्षकों को निष्पक्ष रूप से शैक्षणिक अनुशासन लागू करने की स्वतंत्रता भी चाहिए। शिकायत निवारण तंत्र चाहिए। पर शिकायतों का निर्णय सोशल मीडिया या सड़क पर घोषणाओं से नहीं, बल्कि प्रमाणों से होना चाहिए। क्योंकि IIT किसी भी जाति, पार्टी या विचारधारा की संपत्ति नहीं है। बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय बौद्धिक संपत्ति है।

इसलिए साहिल वाकोडे मामले की सच्ची मांग केवल एक ही होनी चाहिए। सत्य बाहर आना चाहिए। यह किसके पक्ष में जाता है, उससे अधिक यह कि वह सत्य है या नहीं, यह महत्वपूर्ण.....

क्योंकि IIT की सच्ची ताकद उसकी इमारत में नहीं है; वह उसकी प्रयोगशाला में भी नहीं है। उसकी सच्ची ताकद है प्रश्न पूछने का साहस, उत्तर खोजने का तरीका और सत्य स्वीकार करने की ईमानदारी। आज साहिल की मृत्यु ने IIT मुंबई के सामने एक कठिन प्रश्नपत्रिका रखी है। उस प्रश्नपत्रिका में कॉपी, जात, आरक्षण, आंदोलन या राजनीति में से कोई एक प्रश्न नहीं है। बल्कि यह पूरी संस्थागत संस्कृति की परीक्षा है। और इस परीक्षा में IIT को छात्रों की नहीं... बल्कि सबसे पहले अपनी ही उत्तरपत्रिका जाँचनी चाहिए।

क्योंकि दुनिया को भारत की बुद्धिमत्ता दिखाने वाले इस "ज्ञान मंदिर" को यदि फिर से दुनिया के सामने ताठ माने से खड़ा होना है, तो एक बात स्पष्ट रूप से बतानी होगी कि आरक्षण हो या खुली प्रतियोगिता, सामाजिक न्याय हो या गुणवत्ता...; IIT के द्वार से अंदर आए हर एक को संयम... परिश्रम, आत्मचिंतन... और कड़ी अनुशासन का पालन करना ही होगा.......
(वरिष्ठ पत्रकार मंत्रालय अनंत नलावडे)
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