"सी लिंक" को अवधि बढ़ाई.......; जनता पर खर्च का बोझ........? मूल डेडलाइन २०२४; अब सीधे २०२८....!
City News Mumbai••7 व्यूज़•3 मिनट पढ़ें
माहिती अधिकारी कार्यकर्ता अनिल गलगली का 'MSRDC' पर सवाल...
चार वर्षों की देरी की कीमत कौन चुकाएगा.......?
मुंबई, दि.२९ (अनंत नलावडे) - मुंबई की ट्रैफ़िक को तेज़ करने के लिए निर्मित किए जा रहे वर्सोवा‑बांद्रा समुद्री पुल परियोजना को कुल १,४२१ दिनों की समय सीमा बढ़ोतरी मिलती है; लेकिन ठेकेदार की देरी के लिए दंड की कार्रवाई हुई है या नहीं, इसका हिसाब कहाँ है...? ऐसा सीधे सवाल सूचना अधिकार कार्यकर्ता अनिल गलगली ने उठाया है। २४ जून २०१९ को शुरू हुए इस महत्वाकांक्षी परियोजना की मूल पूर्णता तिथि २१ जून २०२४ थी। परंतु चार चरणों में समय सीमा बढ़ाते हुए अब यह तिथि सीधे १७ मई २०२८ पर पहुँच गई है। इसलिए परियोजना को समय सीमा बढ़ोतरी या ठेकेदार को राहत,.....? ऐसा राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल इस अवसर पर उठाया गया है।
MSRDC से RTI में प्राप्त जानकारी के अनुसार, परियोजना को पहली २५० दिनों की समय सीमा बढ़ोतरी कास्टिंग यार्ड के लिए जमीन उपलब्ध न होने के कारण दी गई। उसके बाद कोविड‑१९ के कारण कार्य में हुए व्यवधान का प्रमाण देते हुए अतिरिक्त १८० दिनों की बढ़ोतरी की गई। आगे EPC ठेकेदार के JV में पुनर्गठन के कारण कुल ४८३ दिन, तथा कार्य की सीमा में बदलाव और अतिरिक्त कार्यों का प्रमाण देते हुए और ५०८ दिनों की समय सीमा बढ़ोतरी मंजूर की गई। अर्थात चार समय सीमा बढ़ोतरी की कुल जोड़ १,४२१ दिन...!
‘डेडलाइन’ चार वर्ष आगे; जिम्मेदारी किसकी.......?
समय सीमा बढ़ोतरी के कारण कागज़ पर हों चाहे, प्रत्येक देरी के लिए सटीक जिम्मेदारी किसकी है....? यह मूलभूत सवाल अभी भी बना हुआ है। विशेषकर Webuild‑Apco JV की जिम्मेदारी में देरी के लिए अनुबंध में निर्धारित Liquidated Damages की प्रावधान लागू हुई या नहीं, यदि लागू हुई तो कितनी राशि वसूली गई और यदि नहीं तो उसके पीछे का कारण क्या, इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करने की मांग गलगली ने की है।
क्योंकि, सरकारी परियोजना देर से होने पर डेडलाइन आगे धकेलना आसान है; लेकिन उस देरी की आर्थिक कीमत किसके जेब से जाएगी......? यह सवाल आम मुंबईवासी के पैसे से जुड़ा है।
समय सीमा बढ़ोतरी के साथ खर्च भी बढ़ेगा...? वर्सोवा‑बांद्रा सी लिंक की देरी केवल कैलेंडर की तारीख का मुद्दा नहीं है। यदि कार्य लंबा हो जाता है तो अतिरिक्त मानवशक्ति, मशीनरी, ठेकेदार की दायित्वें, रखरखाव और बदली हुई कार्य सीमा का खर्च बढ़ने की संभावना होती है। इसलिए १,४२१ दिनों की देरी का सार्वजनिक खजाने पर सटीक आर्थिक प्रभाव कितना हुआ या होगा, इसका अलग से हिसाब आवश्यक है, ऐसा गलगली का कहना है। इसलिए प्रत्येक समय सीमा बढ़ोतरी के पीछे का कारण, देरी के लिए जिम्मेदार पक्ष, अतिरिक्त आर्थिक भार और अनुबंध में दंडात्मक प्रावधानों का कार्यान्वयन संबंधी पूरी जानकारी MSRDC को जनता के सामने प्रकाशित करनी चाहिए, यह भी गलगली ने माँगा है।
"सी लिंक" की देरी; ‘दंड’ केवल प्रतीक्षा पर....?
मुंबईवासी के कर के पैसों से चलने वाले परियोजना को १,४२१ दिनों की समय सीमा बढ़ोतरी मिलती है, मूल डेडलाइन २०२४ से २०२८ हो जाती है; लेकिन ठेकेदार पर दंड की तलवार चलायी गई है या नहीं, यह सवाल अनुत्तरित रहता है। इसलिए अब सवाल एक ही है, सी लिंक के देर से पूर्ण होने की ‘समय सीमा’ सरकार बढ़ाएगी, लेकिन देरी की ‘कीमत’ ठेकेदार से वसूलेगी कौन करेगा...?