राजनीतिक जन्म किसकी कृपा से.....? तटकरे-डालवी संघर्ष का विस्फोट; "अगर हम फॉर्म नहीं निकालते".
City News Mumbai••10 व्यूज़•3 मिनट पढ़ें
पर… दलवे का जहरी पलटवार.......!
महाशक्ती वाले मित्र पक्ष… पर रायगड में मात्र “राजनीतिक लेखा” ही चर्चा का विषय है......!
मुंबई, 29 (अनंत नलावडे) – राज्य में महायुति सरकार और रायगड में महायुति के ही नेताओं के बीच खुला राजनीतिक संघर्ष – यह विरोधाभास का चित्र फिर से सामने आया है।
शिवसेना के विधायक महेंद्र दळवी और राष्ट्रवादी कांग्रेस के विधानपरिषद विधायक अनिकेत तटकरे के बीच शाब्दिक युद्ध अब पक्षीय मतभेदों से परे जाकर एक-दूसरे के राजनीतिक अस्तित्व पर सवाल उठाने तक पहुँच गया है।
कुछ दिन पहले महेंद्र दळवी ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए यह आरोप लगाया था कि राष्ट्रवादी वह पक्ष है जो हमेशा खोडा घालता है। उन्होंने कहा कि भाजपा और शिवसेना के विचार एकसमान हैं और आने वाले समय में तटकरे परिवार को राजनीतिक धक्का पड़ेगा, इस इशारे के साथ।
दळवी के इस हमले पर अनिकेत तटकरे ने भी जोरदार जवाब दिया। उन्होंने दळवी की समझदारी पर प्रश्न उठाते हुए दावा किया कि दळवी ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए तटकरे परिवार की मदद ली है। साथ ही विधानसभा चुनाव के दौरान दळवी ने तटकरे परिवार से कितनी बार मदद माँगी, इसका हिसाब हमें मालूम है, यह भी तटकरे ने कहा। इसके अलावा जिल्हा परिषद अध्यक्ष पद की राजनीति में दळवी की पत्नी मानसी दळवी को अध्यक्ष पद दिलाने के लिए दळवी ने तटकरे के पास प्रयास किये, इस दावे को भी उन्होंने उठाया।
इसके बाद दळवी का पलटवार और भी आक्रामक हो गया। “अकले के तारों को न तोड़ें” यह टोला लगाते हुए उन्होंने अनिकेत तटकरे के राजनीतिक अस्तित्व को निशाना बनाया। आगे बढ़ते हुए “सरोगसी बाळ” का उल्लेख करते हुए दळवी ने अत्यंत जहरी शब्दों में आलोचना की। इसके बाद का बयान रायगड की राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गया। उन्होंने कहा, “हमने फॉर्म नहीं निकाला होता, तो लड़ाई हुई होती और हम जीतते, और अनिकेत तटकरे का राजनीतिक जन्म हुआ ही नहीं।” इस वक्तव्य से तटकरे-दळवी संघर्ष केवल दो नेताओं के बीच वाक् युद्ध से आगे बढ़कर यह हो गया कि कौन किसकी राजनीतिक मदद से उभरा, चुनाव के समय कौन किसके दरवाज़े पर गया और स्थानीय सत्ता के समीकरण में कौन किस पर निर्भर था, इसका कथित हिसाब अब सार्वजनिक राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।
रायगड में महायुति की “एकजुटता” या भीतर धूमधाम वाला संघर्ष...?
पालकमंत्रिपद के विवाद के बावजूद स्थानीय स्तर पर महायुति के मतभेद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए, यह संघर्ष दर्शाता है। राज्य में सत्ता का समीकरण एक है, पर रायगड में स्थानीय राजनीति की प्रतिस्पर्धा अलग चित्र पेश करती है। इसलिए आगामी स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं की राजनीति के पृष्ठभूमि पर यह संघर्ष महायुति को कितना महंगा पड़ेगा, यह अब महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्योंकि यदि यह ‘राजनीतिक दंगल’ मतपेटी तक पहुँचती है, तो रायगड की समीकरणों में बदलाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
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“कोण काय म्हणाले”......?
महेंद्र दळवी | शिवसेना विधायक “हमने फॉर्म नहीं निकाला होता, तो लड़ाई हुई होती और हम जीतते। अनिकेत तटकरे का राजनीतिक जन्म हुआ ही नहीं।”